मंगल बाज़ार / रितु
आज मंगल बाज़ार का दिन है। निष्ठा के घर से पाँच गली छोड़कर चौड़े रोड पर लगता है। वह घर का काम जल्दी-जल्दी ख़त्म कर रही थी ताकि वो आज भी बाज़ार जा सके। आज तो उसका इरादा पूरे बाज़ार घूमने का था। वह देखना चाहती थी बदलते मौसम में बाज़ार में नई-नई चीज़ें क्या आई हैं।
बाज़ार जाने का समय होता जा रहा था। वो जल्दी ही तैयार होकर बाहर निकल गई। अपने मोहल्ले की छोटी-बड़ी गलियों को पार करके बाज़ार वाले रोड पर पहुँची। पूरा बाज़ार दूर से ही नज़र आ रहा था। बाज़ार में घुसने से पहले वो कतराने लगी क्योंकि भारी भीड़ थी। फिर वह भी बाज़ार की भीड़ में शामिल हो गई। अलग-अलग तरह की आवाज़ें उसके कानों को तकलीफ़ दे रही थी।
बाज़ार में धक्के-मुक्की के साथ निष्ठा की नज़रें चारों तरफ़ घूमने लगी। हर ओर हैंगर में तरह-तरह के सर्दी के कपड़े बाँसों पर टँगे हुए थे। कहीं जैकेट, कहीं ट्राउजर, कहीं जींस की तो कहीं हाइवेस्ट की पैंट। कई जगह रेहड़ी पर मोजो के सेट भी बिक रहे थे।
कानों में बहुत-सी आवाज़ें आ रही थीं – पचास के चार जोड़े, पचास के चार जोड़े। कपड़ों को देखकर मन में आ रहा था कि ढेरों कपड़े ख़रीदूँ। नीचे एक लंबी लाइन में बहुत से दुकानदार जूते, सैंडल, चप्पल, स्लीपर बेच रहे थे। और जहाँ पर सेल लगी थी वहाँ लगातार अलग-अलग दुकानदार आवाज़ लगा रहे थे – सौ का जोड़ा, सौ का जोड़ा, तो कहीं पचास का जोड़ा। कोई कहता भैया ये पैंट कितने की है? दुकानदार कहता ये तीन सौ की है। ‘क्या तीन सौ की, अभी तो पिछले मंगल को तो दो सौ की थी।’
वह समझ ही नहीं रही थी कि वो अपने लिए क्या ले! वैसे वो चप्पल, एकाध-दो कपड़े और सब्ज़ियाँ ख़रीदने के इरादे से बाज़ार आई थी।
तभी दूर से कानों में एक अलग-सी आवाज़ सुनाई दी –सौ का जोड़ा, पूरे दो साल चलेगी। दिलचस्पी के साथ उधर नज़र घुमाई तो देखा भीड़ के बीच बैठे बाबा अपने ही अंदाज़ में चप्पल बेच रहे थे। वो दोनों चप्पलों को एक साथ मारते और ज़ोर से हँसकर कहते, ले लो, ले लो, दो साल चलेगी।
ये सुन सब उनकी ओर देखते हुए जा रहे थे। उनको देखकर निष्ठा की भी हँसी छूट गई थी। जैसे ही अंकल और निष्ठा की नज़रें आपस में टकराई तो अंकल की हँसी ओर तेज़ हो गई। वो बड़े ज़ोरों-शोरों से चप्पल बेच रहे थे। निष्ठा ने एक जोड़ा उनसे ख़रीदा और मंडी वाले रास्ते की तरफ़ बढ़ने लगी। कुछ क़दम चलते ही वो वहाँ पहुँच गई जहाँ लाइन में एक के बाद एक सब्ज़ी की रेहड़ियाँ लगी हुई थीं। सबके ही ठेले हरे-भरे नज़र आ रहे थे। कहीं मेथी, कहीं गोभी, हरी प्याज और बहुत-सी सब्ज़ियाँ थीं। कुछ काफ़ी सस्ती थी तो कुछ बेहद महँगी। कई सब्ज़ियाँ तो ऐसी थीं जो काफ़ी दिनों से उसने खाई भी नहीं थी, जैसे पालक।
मंडी की हलचल के बीच निष्ठा आगे बढ़ी और उस रेहड़ी पर जा पहुँची, जहाँ पालक बिक रहा था। भैया पालक कैसे दे रहे हो? साठ रुपये किलो। उसे काफ़ी महँगा लगा, उसने आधा किलो पालक ख़रीदा और घर की ओर चल दी।
वह मन ही मन यह सोच रही थी कि वह लेने तो काफ़ी कुछ आई थी, और लौट रही थी सिर्फ़ पालक लेकर।

