पार्क में हम लड़कियों का हिस्सा / रिहाना
मेरा घर सुंदर नगरी के अग्रवाल स्वीट्स वाली गली में है। यह गली बड़ी है जिसका एक छोर गगन सिनेमा की तरफ़ निकल जाता है और दूसरा छोर शनि बाज़ार की तरफ़। इस जगह को सब एफ-2 भी कहते हैं। यहीं पर है हमारा पार्क जहाँ मैं और मेरी सारी सहेलियाँ मिलकर ठिठोली करती हैं। मैं अपने घर के बरामदे में बैठी सभी का इंतज़ार कर रही थी। ना जाने आज क्या हुआ कि कोई आया नहीं, वरना चार बजे से पहले ही हम सब लड़कियाँ अपने पार्क में चली जाया करती हैं। मुझसे रहा नहीं जा रहा था तो मैं अपनी सहेलियों को बुलाने चली गई।
वैसे मेरी गली में मेरी कई हमउम्र लड़कियाँ हैं, लेकिन उनकी अम्मी उन्हें बाहर निकलने नहीं देती हैं। हम लड़कियाँ स्कूल में लंच टाइम में ही खेलते हैं। पार्क में मेरे ही ग्रुप की लड़कियाँ बैठती हैं। वो सभी आज पता नहीं कहाँ अटकी रह गईं, जो अभी तक नहीं आई। मैं यही सब सोचते हुए और अपनी सहेलियों को याद करते हुए सड़क पर निकल गई। ये शनिबाज़ार की सड़क है। यहाँ सब्ज़ियों के ठेले लगे हैं और कई कपड़ों की दुकानें हैं, साथ ही जूते चप्पल की भी दुकानें हैं। जब हमारी स्कूल की छुट्टी होती है तो मैं और मेरी सहेलियाँ ड्रेस और जूते चप्पलों की दुकानों में अपनी पसंद की चीज़ें देखते हैं। कभी-कभी तो हम ऐसे ही बिना पैसे के भी कपड़ों के दाम पूछ लेते हैं ताकि पैसे जमा कर ख़रीद सके।
चलते-चलते मैं सबा के घर पहुँची। उसकी दहलीज़ पर खड़ी होकर सबा से कहने लगी कि चल पार्क में चलकर बैठेंगे। मैंने ध्यान ही नहीं दिया कि अंदर उसकी अम्मी बैठी होंगी। सबा घर में झाड़ू लगा रही थी। मैं कुछ और कहती उससे पहले उसकी अम्मी आ गईं। मैंने सलाम किया तो उन्होंने मुझे अंदर बुलाया।
मैंने सबा से धीमी आवाज़ में पूछा, ‘चलेगी पार्क?’
सबा ने कहा, ‘रिहाना मैं अभी काम कर रही हूँ। काम करके आऊँगी।’
मैंने कहा, ‘ठीक है। जल्दी से काम कर ले फिर साथ ही चल देंगे।’ उसकी अम्मी उसे अकेले तो नहीं ही निकलने देतीं।
मैंने सबा के घर में नज़र घुमाई तो देखा की उसके घर में चिड़िया है। वे मुझे बहुत अच्छी लगीं। चिड़ियों का रंग हरा, गुलाबी, पीला और काला था। चिड़ियों का पिंजरा बहुत प्यारा था। पिंजरे की डिजाइन झोंपड़ी के घर जैसी थी और उसका रंग सफ़ेद था। लेकिन पिंजरे में चिड़िया खुश नहीं थी। पास में रखा दाना भी नहीं खा रहीं थी। मैंने सबा की अम्मी से कहा, ‘खाला ये चिड़िया आप कहाँ से लाए हो?’ सबा की मम्मी ने कहा, ‘ये चिड़िया सीलमपुर से लाई हूँ।’
मैं काफ़ी देर तक बॉक्स में बैठी उस चिड़िया को देखती रही। वो बेचारी एक कोने में सुस्त-सी बैठी थी। उसको देखकर ऐसा लग रहा था जैसे ये चिड़िया मैं ही हूँ, मैं भी ऐसी ही मरियल सी हो जाती हूँ, जब अब्बू मुझे बाहर बैठने और सहेलियों के साथ घूमने नहीं देते हैं। मेरा मन तो कर रहा था कि इन चिड़ियों को मैं खोल दूँ। मैं ऐसा कर भी सकती थी। इसी बीच सबा ने कहा कि रिहाना, मेरा काम हो गया है। सबा घर का सारा काम सँभाल लेती है। सबा को घूमना फिरना बहुत पसंद है इसलिए वह घर का काम जल्दी ख़त्म कर देना चाहती है।
हम जैसे ही घर से निकलने लगे तभी खाला चिल्लाई, ‘ऐ लड़कियों, कहाँ चली तुम लोग?’ मैंने कहा, ‘खाला, यह मेरे घर ही जाएगी, मेरा स्कूल का काम बता देगी न!’ मैं जानती थी कि खाला ऐसे ही हमें जाने नहीं देंगी। फिर मैंने कहा खाला ‘मेरी मेम ने इसे ही समझाया है।’ मैं मन ही मन अल्लाह को याद करती जा रही थी वैसे मैं उन्हें हमेशा शाम के वक़्त ही याद करती हूँ।
सबा ने कहा, ‘अम्मी, मैं बस आधे घंटे में ही वापस आ जाऊँगी।’ खाला से किसी तरह इजाज़त ले हम वहाँ से चुपचाप निकल आए। गली पार कर सड़क पर पहुँच एक-दूसरे का हाथ पकड़ खूब ज़ोर-ज़ोर से हँसे। सबा बोली, ‘यार, हम कितना झूठ बोलने लगे हैं ना!’ मैंने कहा, ‘सच बोलने पर मम्मी कौन-सी हमें जाने देती।’ सबा ने कहा कि अरे हमारी बाक़ी की सहेलियाँ तो रह ही गई।
हम दोनों अपनी बाक़ी सहेलियों को बुलाने निकल पड़े। हम दोनों शनिबाज़ार से निकल रहे थे तो तेज़ आवाज़ें आ रही थीं- टमाटर दस रुपये किलो, हर माल दस रुपये, मेरठ वालों की मशहूर नानखटाई...। साथ ही गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ और लोगों की आपसी बातचीत वगैरह भी सुनाई दे रही थीं।
ये सड़क तो हमेशा रेहड़ियों से भरी हुई रहती है। जगह ही नहीं बचती चलने की। हम भीड़ के बीच से ही निकल गए। सानिया हमें बाज़ार में ही मिल गई। मैंने उससे कहा, ‘चल सानिया पार्क में बैठेंगे और मस्ती करेंगे।’ सानिया ने कहा, ‘तुमलोग चलो, मैं बाज़ार से होकर आती हूँ। अम्मी को सब्ज़ी पकड़ा दूँ, फिर चलते हैं।’
फिर मैं और सबा फ़िज़ा के घर आ गए। उसका घर एच ब्लॉक में है। फ़िज़ा का घर बहुत दूर है लेकिन वह बहुत मस्ती करती है इसलिए उसे साथ लेने का मन रहता है। हम दोनों उसके घर पहुँचे तो वो अपने भाई को खिला रही थी। हम जैसे ही उसके घर पहुँचे तो वो मुस्कुराई। ऐसा लगा जैसे वो हमारा इंतज़ार ही कर रही थी। मैंने उससे कहा, ‘फ़िज़ा, चल पार्क में बैठेंगे।’ उसने कहा, ‘मेरी मम्मी बाहर गई हुई हैं। जब तक मेरी मम्मी बाज़ार से नहीं आ जाती, तब तक हम लोग क्यों ना यहीं मस्ती करें।’ सबा ने कहा, ‘नहीं यार, हमारा टाइम ख़राब ही होगा, तू ताला मार कर चल न!’ उसने कहा, ‘यार नहीं, अम्मी मारेगी। तुम सब चलो, मैं आती हूँ।’
हम उसके घर से बाहर आकर मोचीवाली गली से शॉर्टकट ले निकल गए। जैसे ही हम पार्क के अंदर पहुँचे तो हमें बहुत गंदी बदबू आई। हम सबने यह देखने के लिए नज़र घुमाई कि आखिर इस पार्क में इतनी बदबू क्यूँ आ रही है। ऐसा लग रहा था जैसे पार्क में ही गोबर फेंक दिया गया है। हमारे आस-पास नालियों और गोबर का ढेर था। हम सब समझ गए कि गंदी बदबू नालियों से आ रही है। वैसे ये बदबू हमें अक्सर मिल ही जाती लेकिन आज ज़्यादा ही आ रही थी।
यह पार्क एक शांत पार्क है। इसमें ज़्यादा पेड़-पौधे भी नहीं हैं। शुरू में पार्क में बहुत पेड़ थे, घास भी थी लेकिन अब सब गायब है। ये पार्क मेरे घर के सामने ही है। यहाँ दिनभर लड़कों का जमघट लगता था। हमने इसमें रोज़ झाड़ू मारनी शुरू कर दी। एक-दो पौधे भी लगा दिए जिसमें मैं रोज़ पानी देती हूँ। लेकिन बैट-बॉल खेल खेलकर लड़कों ने पौधे भी ख़राब कर दिए। जब से हम बैठने लगे हैं। अब से ये लोग आते भी हैं तो हमारी वाली साइड पर नहीं आते हैं।
कह सकते हैं कि हमने इसके दो हिस्से कर रखे हैं। एक पाला लड़कों का दूसरा हम लड़कियों का। अपने पाले में मैं एक चारपाई बिछा देती हूँ ताकि जगह घिरी रहे और हम उसी पर बैठकर खूब बातचीत करते हैं।
आज जब हम पार्क में पहुँचे तो मेरी दो फ्रेंड लोहे वाले झूले पर बैठ गईं। फिर मैं अपनी चारपाई ले आई। वहीं से हमारी एक फ्रेंड पार्क के किनारे देखने लगी और हमें बताने लगी कि ‘एक नाई की दुकान है, दुकान के बराबर में चीज़ का खोखा है और उसी के बराबर में प्रेस की दुकान है।’ हम सब को ये दुकान और खोखे बहुत प्यारे लगे क्योंकि ये एक के बराबर एक ऐसे लगे थे जैसे किसी ने करीने से सजा दिए हों। तभी अचानक से सबा बोली, ‘अरे,तुम्हें याद है उस दिन मेट्रो में सफ़र करते वक़्त हमने कितनी मस्ती की थी।’
सानिया उसकी बात बीच में काटते हुए बोली, ‘और लेट होने पर घर में कितनी डाँट सुनी थी। वो तो भला हो इस पार्क का कि हमने एक बढ़िया प्लैनिंग की थी।’ मैंने हँसते हुए बोला, ‘हाय अल्लाह, कितना पटाया था उस दिन हमने अम्मी को। लेकिन सच यार वो कितना अच्छा पल था। हम सभी ने नमाज़ याद की थी। अरे! वो नया नवेला जोड़ा! हाय! कितनी फ़ोटो खिंचवाई थी! तभी सबा बोली, ‘कितनी अच्छी तस्वीर खींची थी। चलो इस बार भी कुछ नया प्लान करेंगे। इस बार हम हज़रत निज़ामुद्दीन चलेंगे लेकिन इस बार सब को बता कर, उस टाइम तो बहुत झूठ बोला था।’ हम सबने हामी भरी। तभी सानिया बोली, ‘जरा आहिस्ता बोलो किसी ने सुनकर हमारे घरों में बता दिया तो फिर घूम लिए।’
फिर वो बोली, ‘अरे, पार्क के सामने देखो एक गली है, उस गली के अंदर बहुत सारे घर हैं और एक घर के बाहर भैंस बँधती हैं। उन भैंसों के गोबर की बदबू आस-पास के घरों के अंदर जाती है, और पार्क के पास तक आती है।’ तभी एक लड़के ने हमारी तरफ़ देखकर इशारा किया। मैंने तो नहीं देखा लेकिन इकरा ने देख लिया। उसने बहुत ज़ोर से चिल्लाकर बोला, ‘अबे, ओ, इधर क्या इशारा किया तूने?’ मैंने बोला, ‘क्या इशारा किया?’ ‘इसने मुझे मिडल फिंगर दिखाई है।’ तभी हम सब चढ़ गई, ‘अच्छा बेटा रुक जरा अभी बताती हूँ।’ इतने में उसके बाक़ी के दोस्त भी आ गए। उन सभी के बाल रंगीन से थे। उन्होंने फटी जींस पहनी थी और गले में लोहे की चेन डाल रखी थी। मैंने कहा, ‘मेरे घर के सामने तू बदतमीज़ी कर रहा है। चल, सॉरी बोल!’
वो नहीं बोला, तो मैंने कहा, ‘रुक ज़रा, पुलिस को बुलाऊँ।’ हमारा हल्ला सुनकर पार्क के सामने वाले दुकान से कुछ लोग आ गए। एक कुर्ता पाजामा वाले अंकल आए। उन्होंने कहा, ‘क्या हुआ?’ हमने सारी बात बता दी। फिर लड़कों को कड़ी डाँट पड़ी और अंकल ने कहा, ‘अगली बार मत दिखना।’ उन्हीं में से एक अंकल आए और बोले, ‘भाईजान मैंने इसकी अम्मी से बोला था कि तुम्हारी लड़की रोज़ यहाँ पार्क में बैठ जाती है। कल को कोई बात ख़राब हुई तो सर फुटाई हो जाएगी।’
मैंने गुस्से से देखते हुए बोला, ‘क्यों अंकल! हम ही घर में रहे, कोई इन लड़कों को क्यों नहीं बोलता!’ इतना कह मैं और मेरी सारी फ्रेंड्स वापस पार्क में आ गईं। अभी भी कुछ लड़के हमारे पार्क में खेल रहे थे। तभी इकरा बोली, ‘रिहाना तुझे बदबू नहीं आती है?’ ‘अरे यार! इकरा तू भी कैसी बात कर रही है, जो लोग जहाँ रहते हैं, उसे वहाँ की आदत हो जाती है, उन्हें फिर खुशबू या बदबू नहीं लगती है।’
फिर हम सब सहेलियाँ मिलकर बातचीत करने लगीं। सानिया बोली, ‘अरे यार! आज मेरा पेपर ख़राब गया है।’ इकरा ने कहा ‘हाँ, तूने सही कहा। मेरा भी ख़राब गया है।’ फ़िज़ा ने कहा, ‘मेरा पेपर अच्छा गया है।’ हम सबने उससे पूछा, ‘तेरा पेपर कैसे अच्छा हुआ?’
फ़िज़ा ने कहा, ‘मैंने घर पर पढ़ाई की थी।’ पार्क के सामने पीले रंग की पुताई वाले घर से एक अंकल शर्ट पहनकर निकल रहे थे। पार्क के सामने से गुज़रते हुए हमें सुनाते हुए बोले, ‘जब ये लड़कियाँ दिनभर पार्क में काट देंगी तो क्या नंबर लाएँगी!’ सानिया से रहा नहीं गया, वो बोली जो ये घूमते-फिरते रहते हैं तो हम क्या इन्हें कुछ कहते हैं। आज तो जो आ रहा है वो ही सुना रहा है। हम अगर घूम फिर लें तो सभी को आफ़त आ जाती है। वो सफ़ेद शर्ट वाले अंकल तो निकल गए लेकिन हमारा मन बहुत उदास हो गया।
तभी सबा ने कहा, ‘चलो, मैं तुम्हें एक डांस करके दिखाती हूँ।’ स्पीकर तो था नहीं, लेकिन मैंने और बाक़ी सहेलियों ने मिलकर गाना गाया ...बलम मेरा...। उसने थोड़ा सा ही नाचा। ऐसा लगा जैसे उसको ये लग रहा था कि कोई उसका मज़ाक न बना दे, फिर हमने एक दो किंग के गाने भी गाए,...तू आके देख ले ... और जादूगर...। हमारे गाने की रिदम इतनी बढ़िया थी कि आसपास के और भी लोग जुड़ गए। फिर पार्क में कंचे खेल रहा लड़का बोला, ‘एक, एक और गाओ।’ सबा ने कहा, ‘इतना पैसा में इतना इच मिलेगा।’ फिर हम सब चल दिए अपने-अपने घर। वैसे पार्क
में कंचे, गिल्ली डंडा वगैरह खेल रहे लोग हमें घूरते हैं लेकिन हम भी हटते नहीं। अगर जब कोई फ़ालतू हरकत करेगा तो हम भी सुना देंगे। पार्क तो हमारा भी है!
मैंने अपनी सभी सहेलियों से कहा, ‘देखो, अगर हम रोज़ यहाँ आकर टाइम से बैठेंगे तो ये हमारी जगह हुई, वरना ये जगह भी इन्हीं के नाम पट्टे हो जाएगी। हम रोज़ यहाँ आकर अपना स्कूल का काम किया करेंगे। अब सुबह तो स्कूल जाते हैं और दोपहर से लेकर शाम तक इस पर हम रहेंगे।’ फ़िज़ा को बातें में दम कम लगा, लेकिन बाक़ी सहेलियों को यह बात ठीक लगी।
अगले ही दिन इतवार का था। आज पार्क में बहुत से लड़के बच्चे आकर खेल रहे थे। अभी सुबह के नौ बजे थे। मैने सोचा
कि चलो कोई नहीं, हम घर का काम निबटा कर आराम से यहाँ बैठेंगे। मैं काम में व्यस्त हो गई और काम करते करते बारह बज गए।
मैं बरामदे की धुलाई के बाद अम्मी को पार्क में बैठने के लिए उकसाती हुई बोली, ‘अरे अम्मी, पार्क में बैठ जाओ। यहाँ क्या कर रही हो?’ अम्मी बोली, ‘अरे लड़के खेल रहे हैं, वहाँ।’ मैंने कहा, ‘इतने पार्क हैं सुंदर नगरी में, वहाँ जाएँ। यही एक जगह मिली है।’ अम्मी ने बात को अनसुना कर दिया। फिर मेरी सहेलियाँ भी आ गईं और पार्क में लड़कों का जमावड़ा देखकर बोली, ‘लो कर लो स्कूल का काम।’ मैंने कहा, ‘अंदर चलो।’ और अपनी अम्मी की खाट भी उठाकर पार्क में डाल दी। अम्मी भी हमारे साथ हो ली, अम्मी को पार्क में देख आसपास की और महिलाएँ आ गईं।
पार्क में अभी भी लड़के मौजूद थे। वे सभी आपस में बहुत गंदी-गंदी गालियाँ बक रहे थे। न जाने आज फ़िज़ा को हिम्मत कहाँ से आई, उसने सभी को चिल्लाते हुए बोला, ‘चलो पार्क से बाहर निकलो, हम बैठे हैं और ये गालियाँ क्यों बक रहा है। उस लड़के ने फ़िज़ा को घूरा और बोला, ‘जा यहाँ से।’ फिर हम सहेलियाँ, मेरी अम्मी और गली की औरतें सब मिलकर उन लड़कों से बहस करने लगीं।
मैंने कहा, ‘एक बात बताओ। और भी पार्क है न वहाँ चले जाओ। हम कौन-सा रोज़ यहाँ आकर बैठते हैं। स्कूल जाते हैं फिर शाम को बैठ जाते हैं।’ जिसको हमने कहा था वह ज़्यादा कुछ नहीं बोला और अपने दोस्तों को लेकर पार्क से बाहर निकल गया। गली की औरतें बोली कि सही किया। इन लड़कों ने बहुत ऊधम मचा रखा था अब बारह बजे सब काम करके यहीं बैठा करेंगे। मैं भी दो चार पेड़ लगा दूँगी और बैठने की सीट रखूँगी। लड़कियों को कहीं घूमने को मिलता ही नहीं! मैं और मेरी सहेलियाँ बहुत खुश थे कि चलो अब सब इस पार्क में ही बैठेंगे।

