खुशियों का बॉक्स / मीनू

गर्मियों का मौसम था। 19 ब्लॉक की पतली-सी गली के दूसरी मंज़िल पर मैं रहती हूँ। एक दिन घर में सब लोग एक साथ बैठकर नाश्ता कर रहे थे। भाई ने कहा आज हम सब सुबह साथ बैठकर खाना खा रहे हैं तो कितना अच्छा लग रहा है, लेकिन गर्मी कितनी है? ऊपर का कमरा होने से ये रूम कुछ ज़्यादा तप रहा है। तभी लक्ष्मी हल्के तेज़ स्वर में बोली हम तो रोज़ ऐसे ही बैठकर खाते हैं। भैया तू आज बहुत टाइम बाद बिना फ़ोन चलाए साथ बैठा है न! इसलिए तुझे ऐसा लग रहा है। तू तो फ़ोन के साथ कभी छत पर, कभी जीने पर खाना खाने बैठ जाता है।

मैंने मम्मी को बोला मम्मी कूलर चलाना। कूलर की ठंडी-ठंडी हवा से ऐसा लगा मानो एसी चल रहा हो। हवा की वजह से मेरे बाल उड़कर बार-बार मेरे चेहरे पर आ रहे थे, जो मुझे बहुत परेशान कर ने लगे। मैंने कूलर को दूसरी ओर मोड़ा ताकि हवा उस तरफ़ भी जाए। मम्मी भी साथ खाना खाने बैठ गईं। वह बोली कुलदीप टीवी ठीक करवाना है, तू तो फ़ोन चला लेता है यहाँ तो मुझे बहुत दिनों से सीरियल भी देखने को नहीं मिला। आज ही किसी को बोल कर ठीक करवा दे। अब तू ही देख, कैसे साइड में बेजान-सा पड़ा है। क्या अच्छा लग रहा है तुझे?

मैंने बोला मम्मी तुम्हें याद है न! एक दिन रात में मैं और लक्ष्मी रिमोट के लिए लड़ रहे थे तो मैंने पूरे कमरे की लाइट बंद कर दी थी और फियर फाइल्स लगा दिया था। और तुम उसे देखते ही बोली ‘अरे हटावा इ हमका डर लग रहा, रोज़ राति के भूत वाला लगा लेत है।’ तब हम कितना हँसे थे, और कितना मज़ा आया था।

पापा ने कहा, ‘टीवी होता है तो घर में अच्छा लगता है। मुझे भी इतना टाइम हो गया है निरहुआ और अमिताभ बच्चन की पिक्चर देखे।’ अरे कुलदीप कल ही इसे ठीक करवा दियो। मैंने मुस्कुराकर कहा पापा, इस पर एक शायरी हो जाए! पापा ने तुरंत जवाब दिया ‘आज बनी है हमारे घर खिचड़ी, कल आई थी मिश्री।’ यह कह उन्होंने अपने हाथ ऊपर उठाए और मुस्कुराते हुए नाचने लगे।

इतना सुनते ही घर हँसी और मुस्कान से खिलखिला उठा। खाना ख़त्म हुआ, फिर कुलदीप को फ़ोन आया, तो वो बात करते हुए बाहर चला गया। पापा भी काम के लिए मैकेनिक की दुकान पर चले गए। रोज़ की तरह मम्मी दोपहर तीन से पाँच की ड्यूटी करने निकल गई। घर में रह गए सिर्फ़ मैं और लक्ष्मी।

मैंने लक्ष्मी से कहा थोड़ा आराम कर लेते हैं फिर घर का काम करेंगे। हम दोनों बेड पर लेट टीवी की बातें करने लगे। लक्ष्मी बोली आज अगर टीवी ठीक होता तो मैं मस्त गाने सुनती और काम करती। मैंने कहा ‘हाँ! और मैं फियर फायर देखती। हम दोनों बातें कर ही रहे थे कि तभी मुझे याद आया अरे छत से कपड़े लाने हैं। मैं छत पर गई तो महसूस किया फ़र्श काफ़ी गर्म हो चुका है। तेज़ धूप से मेरे तो पैर जलने लगे। मैंने जल्दी-जल्दी कपड़े उतारे और नीचे की ओर भागे।

नीचे आकर मैंने लक्ष्मी को बताया कि चार बजे भी छत पर इतनी तेज़ धूप है। सूखे कपड़े तह लगा कर हम बैठे ही थे तभी दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई। मैंने गेट खोला तो देखा भाई एक बड़ा-सा बॉक्स लिए हुए है। मेरी आँखें उस बॉक्स को देख खुली की खुली रह गई, अरे ये क्या तू टीवी लाया है? भाई ने मज़ाक करते हुए कहा, नहीं ये तो ख़ाली डब्बा है। तभी लक्ष्मी ने बॉक्स को हाथ लगाया और कहा, ये तो भारी है तू एलसीडी टीवी लाया है। लक्ष्मी और मुझे तो यक़ीन ही नहीं हो रहा है।  

इतने में मम्मी भी दोपहर का काम कर लौट आई। जब वह आई तो उनके शरीर से पसीने की महक आ रही थी। टीवी देखते ही मम्मी ने पूछा, अरे किसकी है? भाई बोला और किसकी होगी, हमारे घर में है तो हमारी ही, होगी ना! मम्मी बोलीं, पर तेरे पास पैसे कहाँ से आए?

भाई मुस्कुराया और बोला, रुक जाओ, बताता हूँ थोड़ी सब्र करो। ये टीवी किस्तों पर ली है, अभी जब मैं टीवी ला रहा था तो पड़ोस की माधुरी पूछने लगी कितने की ली है! ऑनलाइन मँगवाई है क्या? मैंने उन्हें बोला नहीं पप्पू की दुकान से किस्त पर ली है। थोड़ी महँगी पड़ी लेकिन किस्त पर सामान तो घर में आ जाता है।

घर में खुशियों की लहर दौड़ गई थी। हम सबने कहा, टीवी फिट कहाँ करवाया जाए, सभी सोचने लगे! कुलदीप भाई ने कहा यह बेड के सामने वाली दीवार पर लगवाते हैं। हमारी पहले वाली टीवी बॉक्स वाली थी तो उसे दरवाज़ें के साथ बनी स्लैब पर रखते थे। ये तो एलसीडी टीवी है इसे तो बेड के सामने वाली दीवार पर लगवाना ही ठीक होगा।

मम्मी ने कहा, हाँ! थोड़ा नीचे लगवाओ, नहीं तो गर्दन में दर्द होने लगेगा। तभी टीवी लगाने वाले भी आ गए। उन्होंने जब दीवार में ठक-ठक की आवाज़ करते हुए छेद करना शुरू किया, तो बगल वाली शीला आंटी पूछने आ गईं ‘अरे मीनू, का हो, का आवाज़ आ रहल बा?’

मम्मी मुस्कुराते हुए बोलीं ‘इ कुलदीप टीवी लेता आया है उसी को फिट करवा रहा है और वाई-फाई भी लगवा रहा है।’ थोड़ी देर में टीवी लग गया। मम्मी ने दीदी से कहा जा, ‘पानी दे दे इन लोगों को।’ वह मुस्कुराते हुए बोले, अरे पानी के साथ मीठा भी लाइएगा। जैसे ही टीवी चालू हुआ, घर में सभी का चेहरा खिल उठा। मैंने कहा, अब हमारे घर भी एलसीडी टीवी है।  भाई ने वाई-फाई जोड़ा और गाना चलाया। लक्ष्मी ने लाइट बंद की, गाना लगाया और फिर हम सब नाचने लगे - मैं, लक्ष्मी, मम्मी, और पापा।

घर में पहली बार बड़ा टीवी आने की खुशी में पापा ने अपने हाथ ऊपर उठाए और मुस्कुराते हुए नाचने लगे। हम सबने बूँदी के लड्डू खाए। लक्ष्मी बोली वैसे तो मुझे मीठा पसंद नहीं, पर आज ये लड्डू बहुत टेस्टी लग रहा है। लड्डू का डब्बा हाथ में दे मम्मी ने कहा ले पड़ोस में बाँट आ। सीढ़ियों से उतरते ही मुझे माहिरा मिल गई। मैंने कहा, ले मिठाई खा हमारे घर एलसीडी टीवी आया है। चल तुझे दिखाती हूँ।

टीवी देखते ही माहिरा के मुँह से निकला ‘वाह! फिर वह अपनी उँगलियों से स्क्रीन को छूने लगी और कहने लगी ये तो बड़ी चिकनी है इसके ऊपर की पन्नी मत हटाइयो, और हाँ इसे सूखे कपड़े से ही साफ़ करना, पानी से नहीं।’

मैंने मुस्कुराकर कहा अच्छा और कुछ? चल मुझे अब रिमोट चलाना सीखा, कौन से बटन से टीवी चालू करते हैं, कौन-सा वॉइस वाला होता है और चैनल बदलते कैसे हैं?

आज टीवी देख के मुझे बहुत खुशी हो रही थी। माहिरा के बताने के बाद मैं सही से रिमोट चला पा रही थी। मैंने माहिरा को थैंक्स बोला। माहिरा मुस्कुरा कर बोली, ‘थैंक्स से काम नहीं चलेगा, कल जैन की दुकान से तू मुझे टीवी आने की खुशी में मोमोस खिलाएगी।’

आज टीवी आने से लग रहा था कि समय-समय पर घर में इस तरह की बेजान चीज़ों की भी अपनी अहमियत होती है।

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