छुट्टी वाला दिन / दीपांशी

मेरी मम्मी आरती सुबह-सुबह ही अपने काम पर चली गई। वह पटपड़गंज में काम करती हैं। सिर्फ़ संडे को उनकी छुट्टी होती है। अगर कभी ओवरटाइम लग जाए तो वह भी छुट्टी नहीं रहती। पापा सब्ज़ी बेचने जाते हैं। वे भी दोपहर और रात को ही घर में दिखाई देते हैं वरना पूरे दिन तो रेहड़ी लेकर इधर से उधर फेरी लगाते रहते हैं। आज दूसरा शनिवार होने के कारण स्कूल की छुट्टी थी। मैं और मेरे दोनों भाई-बहन घर पर ही थे। मेरी बड़ी बहन दीपिका और छोटा भाई देव मेरे पास ही बैठे हुए थे। घर में हम तीनों अकेले थे।

घर में सामान फैला हुआ था। पूरे स्लैब पर कपड़े फैले हुए थे, क्योंकि घर में अलमारी तो है नहीं, और कमरा चौथी मंजिल पर है। कपड़े टाँगने के लिए कील ठोको तो मकान मालिक आवाज़ लगाने लगता है। कहता है कील ठोकने से दीवारों में छेद हो जाएँगे। अगर हम एक-दो कील ठोंक भी देते हैं तो वह ज़्यादा दिन टिकता नहीं है क्योंकि कम सीमेंट ज़्यादा रेत लगी होने के कारण कील निकल आती है। इसलिए कपड़े स्लैब पर साइड में रखे हुए रहते हैं। जब भी कोई कपड़े निकालता है तो पूरे स्लैब पर कपड़े फैल जाते हैं। फैला हुआ घर मन को भाता नहीं है।

चाय के गिलास भी स्लैब पर छोड़ दिए गए थे। कमरे में भी कुछ गिलास इधर-उधर पड़ा हुआ था। सोचा कि बाद में एक साथ उठा कर रख देंगे। आज तो अपना दिन है, कौन-सा स्कूल जाना है। मम्मी के आने से पहले सारा काम कर लेंगे, वरना रात को मम्मी आएँगी और घर को फैला देखकर काफ़ी डाँटेगी। वह खाना बना कर गई थीं।

आज उन्होंने बर्तन नहीं धोए थे। वैसे तो वह बर्तन धो देती हैं पर उनको पता था कि आज हम घर पर हैं। सुबह से ही गंदे बर्तन रसोई में पड़े हुए थे। जिसके ऊपर मक्खियाँ भिनभिना रही थी। सुबह कुछ टाइम बाद जब धूप आने लगी तो किचन में भभका-सा होने लगा। लंच के बाद यह भभका और भी बढ़ जाता है। क्योंकि सूरज की दिशा धीरे-धीरे बदल रही होती है, और धूप के कारण बर्तन गर्म होने लगता है। यह देख हम सोचने लगे कि जब हम पहले स्कूल से आते थे तब हमें सारा काम किया हुआ मिलता था। आज पता चल रहा है कि किचन में इतना भभका क्यों होता है। थोड़ी देर भी किचन में खड़ा होना मुश्किल होता है।

रसोई में डब्बे के आकार जैसी एक छोटी-सी खिड़की है। वह खिड़की सिर्फ़ नाम की ही है। उसको भी एक चौकोर आकार की लकड़ी से बंद कर दिया गया है। जिसके एक तरफ़ नहाकर तैयार होने का सामान रखा है शीशा, कंघा आदि और दूसरी तरफ़ जीरा, दालें और मसाले के कुछ पैकेट रखे हुए थे।

जब घर में कोई नहीं रहता तो कमरे के बीच का हिस्सा ख़ाली रहता है। आज काफ़ी ज़्यादा घिचपिच हो रही है। ये सारा काम छोड़कर हम लोग सट-‌सट कर छोटी-सी चारपाई पर लेट कर फ़ोन देखने लगे।

आज फ़ोन देखने की आज़ादी थी क्योंकि आज घर में मम्मी-पापा नहीं थे। कोई यह कहने वाला नहीं कि फ़ोन बंद करो। कई बार जब पापा खाना खाने आते हैं तो फिर जाते नहीं, लेकिन आज वे भी नहीं आए हैंै। हम लेटे-लेटे फ़ोन में भूतिया फ़िल्म देख रहे थे। फ़िल्म देखते हुए हम सोच रहे थे कि भूत सच में होते हैं क्या? कभी हमें मज़ा आता तो कभी हम एकदम से सहम कर डर भी जाते।

फ़िल्म देखते-देखते ही फ़ोन स्विच ऑफ़ हो गया। सूरज की रोशनी और परछाई अब दरवाज़े तक आ गई थी। पंखा लगे होने के बावजूद भी हमें अपने हाथों से बार-बार पसीना पोंछना पड़ रहा था। तभी मैंने अपनी बड़ी बहन से कहा, अरे सुन हम ख़ाली ही तो बैठे हैं। आज हम कुछ अच्छा सा खाना बनाते हैं।

भूख भी लग रही है। मेरी बड़ी बहन ने कहा अरे भूख को छोड़ो कुछ अलग-सा बनाते हैं। तभी मैंने उसे कहा कि ब्रेड पिज़्ज़ा बना लेते हैं। उसकी रेसिपी मैंने यू-ट्यूब में देखी हुई है। बहन ने कहा, अरे हाँ, मैंने भी देखा है। मेरी बड़ी बहन ने मुझे पचास का नोट देते हुए कहा, बीस वाली ब्रेड, चीज़ और सॉस लेकर जल्दी आ जा।

मैं पासवाली दुकान से सारा सामान लेकर तुरंत आ गई। इतनी ही देर में मेरी बहन ने रसोई में पड़े सारे बर्तन धो दिए थे। मैंने अपनी बहन से कहा कि जब तक तू यह बना तब तक मैं अंदर से बाहर तक सफ़ाई कर देती हूँ। जब तक मैंने सफ़ाई की तब तक मेरी बहन ने ब्रेड काट कर, तेल लगाकर उसे गर्म किया फिर उसके ऊपर सॉस, कटे हुए टमाटर और चीज़ वगैरह डालकर उसको बेक करने को रख दिया।

पिज़्ज़ा बन गया तो मैंने कहा कि इसमें से मम्मी-पापा के लिए भी रख देना। वे लोग कहते हैं कि कुछ भी बनाया करो तो हमारे लिए भी रख दिया करो। तुम लोग कुछ सीख ही तो रहे होते हो, इससे उन दोनों को खुशी मिलती है।

साफ़-सफ़ाई कर हम चारपाई पर बैठकर ब्रेड पिज़्ज़ा बड़े ही मज़े से खाने लगे। इतने में ही मम्मी आ गई। वह कहने लगीं, अरे घर बड़ा साफ़-सुथरा हो रखा है।

मैं मुस्कुराते हुए अपने मन में खुद ही बुदबुदाने लगी, अरे मम्मी आपको क्या पता आज पूरे दिन घर कैसा रहा! घर का माहौल कैसे पल-पल बदलता रहा।

मम्मी फिर बोलीं, अरे बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है। आज क्या बना लिया? तुम लोग कुछ ना कुछ बनाते ही रहते हो।

मैंने हँसते हुए कहा, ‘मम्मी हम लोग कुछ तो सीख ही रहे हैं ना!’

मम्मी भी मुसकुराते हुए बोली, ‘हाँ, हाँ मैं कौन-सा तुम्हें डाँट रही हूँ।’

तभी मेरी बड़ी बहन मम्मी के लिए रखी हुई पिज़्ज़ा ले आई।

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