क्या! यह मैं ही हूँ! / महक

रमजान का तीसवाँ दिन ख़त्म होने वाला था। उसी दिन चाँदरात भी थी।  चाँदरात के दिन सभी गली वालों ने मुझसे मेहँदी लगवाई। उनलोगों ने पहले ही बोल रखा था कि इस बार हम तुमसे ही मेहँदी लगवाएँगे। 

 

मुझे अलग-अलग डिजाइन की मेहँदी लगानी आती है। चाँदरात के अगले दिन ईद थी। मुझे नींद नहीं आ रही थी, मैं बस यह सोचे जा रही थी कि जल्दी से सुबह हो और मैं ईद का मेला घूमने जाऊँ और ईद के कपड़े पहनूँ। इस बार मैंने बहुत तैयारियाँ की थी क्योंकि अब मैं बड़ी हो चुकी हूँ।  

 

आज सुबह से ही घर में गर्मजोशी का आलम था। हम यानी मैं, बाजी और अम्मी दो दिन पहले से ही ईद की तैयारियों में लगे हुए थे। इस दिन सभी रिश्तेदार और आसपास के लोग ईद पर मिलने घर आते हैं, बैठते हैं, सिवईयाँ  खाते है। इसलिए घर सुंदर और साफ़ दिखाई दे उसके लिए हमने अपने नीचे वाले कमरे को सजाया हुआ था। बड़ी-बड़ी लाल पीली सफ़ेद रंग की लाइट लगा रखी थी। जिससे आज घर में एक अलग ही रौनक थी। ये तैयारियाँ हमने मिलकर ही की थी।

 

अम्मी से पैसे ले मैं एफ वन मार्केट चली गई। नींद अभी भी ठीक से दुकान पर ही खुली। मैंने देखा सड़क पर  सभी आदमी कुर्ता पजामा पहने हुए ईद की नमाज पढ़ने जा रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चे नए कपड़े पहने हुए थे। मैंने जल्दी-जल्दी घर का सारा काम निपटाया और नौ बजे नहाने चली गई। नहा-धोकर मैंने नीले रंग का ट्राउजर सूट पहना। यह सूट ज़ीनत फैशन से सिलवाया था। हमारे मोहल्ले में एक वही हैं जो आज के फैशन के हिसाब से कपड़े पहनती हैं और सिलती भी हैं। मैं पहली दफा सिम्पल सिलाई और गोल गले के सूट के अलावा कुछ नया पहनूँगी।

 

मैंने यूट्यूब पर एक पाकिस्तानी सूट देखा था, जिसके बाजू थोड़े चौड़े होते हैं और गले ज़्यादा गहरे भी नहीं होते हैं। एक लंबी लूज़ कुर्ती, मसलीन की मिल जाता तो और भी अच्छा रहता। मैंने अपने भाई के फ़ोन में रात के वक़्त अलग-अलग डिजाइन के सिम्पल लुक के सूट देखे थे। पर इस सूट को बनवाने में मेरी मदद की मेरी दोस्त आशियाना ने, जो फैशन पर बड़ी बारीकी नज़र रखती है। उसने मुझे सलाह दी की इस बार मैं पाकिस्तानी सूट पहनूँ। हमने एफ-2 के शनिबाज़ार में पूरा बाजार ही छान मारा। लेकिन हमें फ़ोटो के मुताबिक कपड़ा नहीं मिला।

 

एक कपड़ेवाले ने मुझे बताया कि सुन्दर नगरी में जे ब्लॉक में एक लड़के की कपड़े की थान की दुकान है, वहाँ एक बार जाकर देखो उसके पास होगा। आशियाना और मैं भीड़ को चीरते हुए गलियों से होते हुए बाहर निकल गए और बताए अड्रेस पर पहुँचे।

 

हमने अपने मोबाइल से सूट का फ़ोटो निकाला और अपनी बारी आने पर झट से फ़ोटो को सूट वाले के सामने रख दिया। यह देख फ़ोन हाथ में ले उसने गोदाम में नज़र घुमाई। कुछ देर में वो कपड़ों की थान ढूँढ़ कर हमारी बताई कलर और कपड़ा ले आया, पर जब फ़ोन से कपड़ा मिलाया तो कपड़े का रंग थोड़ा कम लगा। उसने हमसे कहा—बाजी फ़ोटो की बात अलग होती है, आप आँख बंद कर के मेरे कहने से ये कपड़ा साथ ले जाओ, पाकिस्तानी सूट की माँग है इन दिनों। आप पहली ग्राहक नहीं हो। मैंने कपड़े को छूकर देखा वो सुन्दर तो लग ही रहा था। कपड़ा पसंद आया तो कपड़े के भाव पर बात आकर रुक गई। 90 रुपये मीटर ज़्यादा लग रहा था। मोलभाव के बाद 70 रुपये मीटर के दर से 4 मीटर लिया। फिर हमने जल्दी से पैसे दिए और सीधे घर की ओर निकल गए।

 

इफ़्तार का भी समय हो चला था। हम दोनों जे ब्लॉक से एफ-2 की मस्जिद तक गलियों से ऐसे भागे जैसे ट्रेन छूट रही हो, फिर मस्जिद के पास आकर साँस ली। और फिर शनिबाज़ार के लिए तेज़ी से दौड़े, फिर वापस घर पर ही रुके। अम्मी कुछ कहतीं इससे पहले ही मैंने उन्हें अपना सूट का कपड़ा दिखाया, जिसे देखकर वो बहुत खुश हुईं। बोलीं, तुझपर ये रंग खिलकर आएगा, आज ही सिलाई के लिए दे आ।

 

मैंने खजूर लेकर रोज़ा खोला। फिर मैंने जल्दी से सामान उठाया और चल दी ज़ीनत बाजी के पास। वो अपनी मशीन के पास ही बैठी हुई थी। मैं थकी मांदी उनके पास गई और बताया कि मुझे क्या पहनना है। जीनत बाजी ने इस बार गोल गला नहीं वी नेक का गला और खुली आस्तीन बनाने और पीछे डोरी लगाने को कहा।  मैंने उनसे कहा, मैं इस बार अलग दिखना चाहती हूँ। ज़ीनत बाजी ने मेरे सूट के हिसाब से हेयर स्टाइल भी बताए। हर बार मैं बाल खुले या चोटी बाँध लेती थी, लेकिन इस बार मुझे हाईबन और कर्ली हेयर रखने को बोलीं।

 

मैं अपना मेकअप का सारा सामान लेकर बराबर वाली बाजी के घर चली गई। मैं कहीं भी फंक्शन में जाती हूँ तो उन्हीं बाजी से मेकअप करवाती हूँ क्योंकि वह मेकअप अच्छा करती हैं। उन्होंने मुझे अलमारी के पास बिठा दिया। उस अलमारी पर बहुत बड़ा शीशा लगा हुआ था। उस शीशे पर सफ़ेद फूल एक क़तार में चिपके हुए थे। उस अलमारी के अंदर उनका मेकअप का सामान रखा हुआ था। उन्होंने उसमें से कुछ मेकअप का सामान भी निकाला।

 

पहले उन्होंने मेरे बालों पर प्रेसिंग की और फिर यूट्यूब पर देखकर हाईबन बनाया। मेरे बाल और दिनों से ज़्यादा ही खूबसूरत लग रहे थे, फिर चेहरे पर मेकअप करना शुरू कर दिया। मैहरून रंग के सूट पर मेरे स्टाइलिश बाल और भी सुंदर लग रहे थे। उन्होंने मेरे चेहरे पर  पहले ‘फेयर एण्ड लवली’ क्रीम लगाई। फिर ‘पॉन्ड्स बेबी क्रीम’ और ‘नायिका’ का फाउंडेशन लगाया। उसके बाद गालों पर लाल रंग का ब्लेसर का आईशैडो लगाया और उस पर मेकउप फिक्सर लगाया। वह जब भी मेरे चेहरे पर कुछ लगातीं तो मैं उनसे यही कहती कि ‘बस हल्का मेक-अप करना’ जैसा नूड मेकअप होता है।

 

बाजी कहती हैं, ‘हाँ हाँ वही ही कर रही हूँ।’ फिर उन्होंने आँखों पर लक्मे का आईलाइनर लगाया और होठों पर गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगाई।

 

जब मेरा पूरा मेकअप हो गया तो फिर उन्होंने कानों में  इयरिंग्स्, माथे पर टीका और गले में हार पहनाया। जब मैं पूरी तैयार हो गई तब उन्होंने मुझे अलमारी पर लगा शीशा दिखाया। मैंने जब अपने को शीशे में देखा, तो मैं एकदम से अपने को देखती ही रह गई। मेरे मुँह से निकला, ‘क्या यह मैं ही हूँ?’

बाजी मुसकुराते हुए बोलीं ‘बेशक ये तुम ही हो।’

 

मैं बहुत सुंदर लग रही थी, शायद इतना मैं पहली बार तैयार हुई थी। मैं अपने आपको पहचान नहीं पा रही थी। आज मैं बहुत खुश थी।  मैंने अपना मेकअप का सामान लिया और बाजी को ‘थैंक यू’ कह कर, घर आ गई।  

घर में अम्मी-पापा और बाजी बैठे हुए थे। जब अम्मी-पापा ने मुझे तैयार देखा तो कहने लगे ‘अच्छी लग रही है।’ पापा ने मुझे ईदी में दो सौ रुपये दिए।  इतने में फिज़ा आ गई। फिजा ने कहा, ‘चल महक घूमने चलते हैं।’

मैंने कहा, ‘ठीक है, मैं आ रही हूँ।’

 

मैंने घर से बाहर निकलने से पहले शीशे में देखा कि मैं सही तो लग रही हूँ। कहीं लिपस्टिक तो नहीं छूट गई, आँखों से काजल तो नहीं फैल गया। मुझे यह करता देख मेरी बाजी कहने लगीं कि यह शीशा अपने गले में बाँधकर ले जा और रास्ते में देखती रहना। मैंने उनकी बातों को अनसुना किया और फिजा के साथ घूमने चली गई।

 

हम ‘फॉर सिलाइज् पिज़्ज़ा’ शॉप गए। जो मेरे घर के पास ही है। हमने, साठ रुपये वाला ओनियन पिज्जा खाया। मैं पिज्जे को इस तरह खा रही थी कि होंठ से मेरी लिपस्टिक ना छूटे। जब हमने पिज़्ज़ा खा लिया तो फिजा से पूछा मेरी लिपस्टिक तो नहीं छूटी है। फ़िज़ा ने हँसते हुए कहा, अरे नहीं छूटी है।

 

सभी को मेरा सूट का स्टाइल बहुत पसंद आया। आज का दिन हमारा था। फ़िज़ा बोली यार तू तो मशाअल्लाह! बहुत सुंदर लग रही है, मेरी भी शॉपिंग करवाना।

 

फ़िज़ा ने कहा, 'घर चलते हैं मेरे पैरों में दर्द हो रहा है। वैसे भी अब समय काफी हो चला था।’ हमने रिक्शेवाले भैया को बीस रुपये दिए और घर पहुँच गए। फ़िज़ा रिक्शे से उतरकर अपने घर चली गई।

 

मैं जैसे ही घर में घुसी तो सामने ही मेरे बड़े भाई बैठे थे। मुझे लगा था कि इस समय तक सब लेट गए होंगे। क्योंकि सभी सुबह से उठे हुए थे, मैं चुपचाप अपना मेकअप साफ़ कर लूँगी। लेकिन जैसे ही मैं अंदर घुसी सामने ही बड़े भाई बैठे थे। वो मुझे देखते ही चिल्लाने लगे, होठों पर इतनी तेज लिपस्टिक क्यों लगाई है और ये कैसा सूट है।  

 

मैं बोली ‘क्या ख़राबी है, एक सूट है, और बाल इस बार हाईबन और खुले बाल रखी हूँ। थोड़ा सज सँवर ली तो क्या हुआ? रोज़-रोज़ थोड़े ही ऐसा करती हूँ।'

 

हैरानी की बात तो यह है कि इसी फैशन को टीवी और सोशल मीडिया पर खूब प्रोत्साहन मिलता है, और अपने ही घरों में नकार दिया जाता है। पर मैं अब अपनी मर्ज़ी की मालिक हूँ और ये बदलाव मुझे पसंद आ रहा है। इस तरह से इस बार मेरी ईद गुज़री।

 

 

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