सबाल्टर्न फ़ैशन- फ़ैशन की दुनिया में प्रवेश / प्रियांशी
शालू जिसके घुँघराले बाल हैं और देखने में साँवली है। वह खिचड़ीपुर में ही परिवार
के साथ रहती है। उसे यहाँ रहते काफ़ी वक़्त हो गया है। काफ़ी दिनों से वह नौकरी
ढूँढ़ रही है। वह अपने घर के पास रहने वाली अपनी दोस्त से नौकरी के बारे में
पूछती तो कभी आस-पड़ोस में रहने वाले लोगों से बात करती। एक दिन उसकी
दोस्त प्रिया ने उसे लक्ष्मी नगर के मॉल में ‘सेल्स गर्ल्स एसोसिएट’ यानी ग्राहकों का
स्वागत करना और सही प्रोडक्ट चुनने में उनकी मदद करने की नौकरी बताई। उसने
ऑनलाइन फॉर्म भर दिया। उधर से तुरंत मैसेज भी आ गया कि आपकी नौकरी लग
गई है।
अगले दिन उसे काम पर जाना था। वह सोचने लगी कि मॉल में तो हर एक तरह के
लोग आते हैं, जिनको मुझे देखना होगा। मेरे ही दिए इंप्रेशन पर कस्टमर सामान
ख़रीदेगा। वैसे भी मुझे तो पहले से ही पता है कि कौन से अवसर पर कैसे तैयार
होकर जाना होता है। मेरा फ्रेंड सर्कल ही ऐसा है कि हम भी कभी फ़ोन पर तो कभी
इकट्ठे होकर इन चीज़ों पर बातचीत करते रहते हैं।
इसलिए मैं आज ही जाकर पास वाले ईडीएम मॉल से अपने लिए ब्रांडेड कपड़े और
जूते ले आऊँगी उन कपड़ों का ट्रेंड भी होता है और ब्रांड की लिस्ट तो मेरे दिमाग़ में
पहले से ही है। शालू ने अपनी मम्मी से जाकर कहा, मम्मी मुझे थोड़े से पैसे दे दो
ताकि मैं अपने लिए कुछ सामान लेकर आऊँ, मुझे कल से ही काम पर जाना है।
2
शालू की मम्मी गीता के चेहरे पर अब हल्की-फुल्की झुर्रीयाँ दिखाई देने लगी हैं। वो
बॉली कि पहले से ही इतना तो पहनने को तेरे पास है और क्या लेगी? जब भी तुझे
कहीं जाना होता है तो तुझे कुछ नया चाहिए होता है? ना चाहते हुए भी उसकी
मम्मी ने उसे पाँच सौ रुपये दिए। उसने तुरंत मम्मी को कहा, “पाँच सौ रुपये में
क्या होगा मम्मी? पाँच सौ रुपये कम से कम और दो।”
हज़ार रुपये लेकर वो आनंद विहार ईडीएम मॉल जाने के लिए बस में बैठ गई। तब
तक फ़ोन पर सर्च कर रही थी कि अभी ट्रेंड में कौन से लोअर और टॉप है। उसे
ट्रेडिंग लोअर और टॉप चाहिए जो कंफर्टेबल भी हो और पहनकर देखने में वह सुंदर
भी लगे।
मॉल में वो कपड़े वाले स्टॉल पर गई जहाँ हर तरह के और हर डिजाइन के कपड़े
टँगे हुए थे। वह रैक में लगे लोअर देखने लगी, फिर उसने बहुत सारे कलर के
ट्राउजर देखे। ब्लैक कलर का ट्राउजर उसे पसंद आया। उसने उसे ख़रीद भी लिया।
उसने वहीं से एक टॉप भी ख़रीदा। फिर वह मेकअप वाले कॉर्नर में गई। वहाँ हर
शेड में लिपस्टिक लगी थी। वह सोचने लगी कि अभी थोड़े से पैसे बचे हैं क्यों ना मैं
यहीं से एक अच्छी शेड वाली लिपस्टिक ख़रीद लूँ, जो मेरे फेस पर नेचुरल लगे।
शालू एक-एक लिपस्टिक को अपने हाथ पर लगाकर देखती जा रही थी। लिपस्टिक
के अलग-अलग शेड जैसे पर्पल, डार्क रेड, मैरून और फेस कलर को देखा। काफ़ी देर
बाद उसने एक फेस कलर की शेड में मिनी लिपस्टिक ख़रीदी, जो उसके चेहरे पर
3
एकदम नेचुरल लग रही थी। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि उसने लिपस्टिक लगा
रखी है। बस उसके होठों की आकृति नज़र आ रही थी। उसने मॉल से ही एक पर्पल
कलर का मिनी बैग भी ख़रीदा जो डिजाइनर कपड़े का बना हुआ था। उसके ऊपर
मोतियों से डिजाइन किया गया था।
उसने सोचा कि इतना सामान तो ख़रीद ही लिया है, मेकअप का थोड़ा सामान घर
के पास वाली कॉस्मेटिक की दुकान से लूँगी क्योंकि यहाँ पर सामान बहुत महँगा है।
और कुछ सामान तो मेरे पास घर में रखा हुआ भी है।
शालू बस से घर लौटी। उसने सारा सामान सामने वाले स्लैब पर रखा जो वह मॉल
से लाई थी। फिर शालू ने अपनी गुल्लक उतारी जिसमें वह पिछले छह महीने से
पैसे डाल रही थी। उसने गुल्लक तोड़कर पैसे निकाले और शॉप पर गई। उसने
दुकानदार को आई लाइनर दिखाने को कहा। उसने दस रुपये वाला एक आई
लाइनर ख़रीद भी लिया ।
काफ़ी दिनों से वह सोच रही थी कि क्यों ना मैं अपने बालों की बटरफ़्लाई कटिंग
करवा लूँ। आज यह उसे मौक़ा मिल ही गया। वो घर के पास वाले ‘पूजा ब्यूटी
पार्लर’ गई। और फ़ोन में पर बालों का डिजाइन दिखाकर, वैसे ही बाल काटने को
कहा। बाल कट जाने के बाद उसने पैसे दिए। उसने अपने बालों की कटिंग के फ़ोटो
अपनी दोस्तों के पास भेजी। फ़ोटोज़ देखते हुए उसके दोस्तों ने थंब का निशान
भेजा। वह बार-बार अपने बालों को देखती और फिर उन पर हाथ फेरती। कभी
4
नाइक ब्रांड के जूते पहन कर चल कर देखती। अगले दिन शालू जल्दी उठी। नहा-
धोकर वो तैयार होने लगी। जब वह तैयार होकर निकली तो सब उसे देखकर
मुस्कुरा रहे थे। ये देख वह सोचने लगी कि शायद इस बार का उसका लुक शायद
सबसे अलग है।
अगले दिन जब वह नौकरी पर पहुँची तो उसने देखा कि वहाँ बहुत-सी लड़कियाँ
पहले से काम कर रही हैं। वो उनसे बातचीत करने लगी। फिर उसने अपनी बैठने
की जगह पूछी कि उसे कहाँ बैठना है। वहाँ जितनी भी लड़कियाँ बैठी थीं, सबके
तैयार होने का ढंग अलग-अलग था। सब एक-दूसरे से अलग दिख रही थीं। शालू
काम करते हुए यह सोच रही थी कि मुझे अपने आपको इतना बेहतर बनाना है कि
लोग मुझे देखकर सोचे कि हाँ हमें यह अच्छी सलाह दे सकती है। एडवाइस देना भी
एक कला है। मेरे एडवाइस देने से ही मेरी जगह बनेगी।
ऐसे ही उसका रोज़ का रूटीन शुरू हुआ।

