लोगों को स्वाद और अपने लिए कुछ पैसे/ जास्मिन 

तीस ब्लॉक, नवशक्ति स्कूल से पहले वाले चौड़े रोड पर अपने घर की गली के बाहर लकड़ी के बने टेबल पर गीता मोमो की दुकान लगाती है। अपनी दस फुट की पतली गली में अपने घर के बाहर एक चारपाई डाल कर वह बैठती है। अपनी गली से लेकर मोमोस लगाने वाली जगह तक वह पहले झाडू लगाती है। झाड़ू लगाने के लिए गीता कभी उकड़ू  बैठती है तो कभी उसे झुकना पड़ता है। ज़्यादा देर एक ही तरह बैठने या झुकने से दर्द बढ़ जाता है इसलिए वो अपनी अवस्था बदलती रहती है। लकड़ी के टेबल पर एक जगह गैस चूल्हा ओर मोमो स्टीम करने का बर्तन रखा होता है। और उसके साथ ही लाल रंग की चटनी ओर मियोनिस रखी होती है। वह सिर्फ़ सोयाबीन ओर पत्तागोभी वाले मोमो ही बनाती। चटनी व मियोनिस भी घर पर ही बना कर ले जाती है। उसका कहना था कि बाहर की चटनी ओर मियोनिस में पानी ज़्यादा मिला होता है और चटनी का स्वाद भी कुछ ज़्यादा अच्छा नहीं होता। मैंने कई बार बाजार से ख़रीदे हुए मोमोस ला कर बेचे हैं, लेकिन लोगों को उसमें स्वाद नहीं मिला। लोगों के कहने पर मैंने घर पर ही मोमोस बनाने शुरू किए। वह सुबह चार बजे से ही मोमो बनाने की तैयारी में लग जाती है।

  
उसे उठने में किसी अलार्म की ज़रूरत नहीं पड़ती। सबसे पहले वह मोमो बनाने के लिए मैदा का आटा तैयार कर के रख लेती है। इसके बाद कुछ देरी के लिए सोयाबीन को पानी में भिगो देती है। और उसका मिक्सचर तैयार कर लेती है। स्प्रिंग रोल बनाने के लिए सारी सब्ज़ियाँ काट कर रख लेती है। एक दिन में वह कम से कम बीस रोल बनाती है। साथ ही, फिंगर बनाने के लिए लंबा-लंबा टुकड़ा काट लेती है। उसके बाद चटनी बनाना शुरू करती है। चटनी को वह सिलबट्टे पर ही पीसती है क्योंकि उस से स्वाद ज़्यादा बढ़ जाता है। इसके बाद मियोनिस बनाती ये सब करते-करते दोपहर के बारह या एक बज ही जाते है ।

इन्हें बनाने के बाद उन्हें स्टीम पर रखती और जैसे ही काम पूरा होता दोपहर से ही दुकान लगाने लगतीं। इतने में पोती भी स्कूल से आ जाती और दुकान लगाने में थोड़ी बहुत मदद वो भी कर देती। वह दोपहर में ही दुकान लगातीं, क्योंकि घर में मन नहीं लगता और दोपहर में जल्दी से किसी के यहाँ मोमोस भी नहीं मिलते हैं। इसलिए स्कूल से आ रहे बच्चे उनके ठेले को देख खुश हो जाते और मोमो खाने लगते। कभी-कभी तो मोमोस से ज़्यादा फिंगर बिक जाते ।

उनके घर के सामने एक खाट रखी है और एक कुर्सी रखी हुई है, जिस पर वो कुछ वक़्त के लिए आकर बैठ जाया करती है। गीता को मोमो का ठेला लगाते आठ साल हो गए। उनके मोमोस का स्वाद लोगों को उनकी दुकान पर खींच लाता है। लोग स्वाद के आगे दाम नहीं देखते। उनके चटपटे मसालेदार मोमोस कि ख़ुशबू से ही मुँह में पानी आ जाता है। गीता की उम्र क़रीब पचास साल की होगी। मैंने ज़्यादातर उन्हें मैक्सी पहने ही देखा हैं। उम्र के साथ उनके बाल थोड़े सफ़ेद हो गए हैं। वह अक्सर बालों का छोटा-सा जूड़ा बनाए और कानों में सोने की छोटी-सी बाली पहने ही नज़र आतीं। 

गीता बताती हैं कि मोमो लगाने का विचार उन्हें उनके बेटे ने ही दिया था। उनका बेटा नोयडा में बाजार से ख़रीदे हुए मोमो बेचा करता था। लेकिन बाद में उसने अपना दूसरा काम शुरू कर लिया। उस समय वह फेज-1 की तरफ़ घरों में साफ-सफाई का काम करती थीं। लेकिन एक दिन वहाँ से लौटते वक़्त उनका एक्सीडेंट हो गया जिससे उनके पैरों में दर्द रहने लगा। चेहरे पर अभी भी एक्सीडेंट के निशान हैं ही ।

गीता का कहना है कि कॉल तो उसे अभी भी आता है कि वह फिर से काम करे, लेकिन अब वह मना कर देती है। मोमोस बनाने के बर्तन घर पर पहले से थे ही। बाकी जो सामान लगता वह आसपास कि दुकानों पर मिल ही जाता है। इस तरह पूरा दिन भी बीत जाता है और इस काम को करना उन्हें अच्छा भी लगता है। दुकान वह रात आठ बजे तक बढ़ा दिया करती है। लेकिन कभी-कभी मोमोस ख़त्म ना होने कि वजह से दस भी बज जाया करते हैं।

गीता उम्र के साथ ढल जाने वाली औरत नहीं थी। काम चाहे कुछ भी हो वो करती रहती, भले ही उसे करने में मेहनत ज़्यादा लगे। उसकी नज़रें सीधे अपने ठेले पर टिकी होतीं, और ग्राहक का इंतज़ार कर रही होती। जैसे ही कोई दिखता, झट से उठकर सीधा दुकान की ओर बढ़ जाती। गीता का तेज़ चलना भी ऐसा लगता है मानो वो धीरे-धीरे चल रही हो। ऐसा उनके पैर में हमेशा दर्द रहने की वज़ह से होता। चलते वक़्त कभी-कभी वो घुटने पकड़ कर रुक जातीं ओर फिर रफ़्तार पकड़ कर लेती। ग्राहक से वह प्यार से पूछती, हाँ बेटा जी, बोलो क्या चाहिए? रुको देती हूँ। और फिर थोड़ी देर वहीं लगी कुर्सी पर बैठ जाती। और जैसे ही देखती कोई ग्राहक नहीं आ रहा है तो वापस अपनी खाट पर जाकर बैठ जाती क्योंकि कुर्सी पर ज़्यादा देर बैठने से उनके पैर की नस चढ़ जाती और दर्द भी बढ़ जाता। खाट पर दोनों पैर को फैलाकर बैठने से गीता को काफ़ी आराम मिलता है। इसलिए वो कुर्सी से ज़्यादा खाट पर बैठतीं हैं।

गीता मोमोस बनाने का सामान तीस ब्लॉक की डिस्पेंसरी के सामने वाले एक जनरल स्टोर से लाती है। वहाँ थोक पर सामान लेने पर बाकी दुकानों के मुकाबले कम दाम पर मिलते हैं। और वह दुकान घर के थोड़ा पास भी है तो ज़्यादा  दिक़्क़त नहीं रहती। उस जनरल स्टोर से वो महीने भर का सामान एक ही बार में ले आती है ताकि उसे बार-बार सामान लेने न जाना पड़े। वह काफ़ी समय से वहाँ से सामान लेती हैं इसलिए उनकी उस दुकानदार से अच्छी जान पहचान है, जिससे उसे उधार पर भी सामान दे देता है। साथ ही गीता के पास कुछ सामान ख़त्म हो जाए तो बस एक कॉल पर सामान घर पहुँचवा देता है।

मोमो, रोल और फिंगर बनाने के लिए सब्ज़ी देने रमेश रोज़ आ जाता है। रमेश ठेले पर सब्ज़ी बेचने गली-गली जाता है। गीता रोज़ सब्ज़ी लेती है, इसलिए उसे भी मालूम हो गया है कि गीता को कौन-सी और कितनी सब्ज़ियाँ चाहिए।  इसलिए वह उन्हें पहले से ही अलग करके रख देता है। और रोज़ शाम के छह बजे क़रीब सब्ज़ियाँ दे जाया करता है। वो खुद गीता से कहता है अम्मा अगर कभी पैसे न भी हों न, तब भी आप सब्ज़ी ले ही लेना, आप कौन-सा कहीं भाग जाएँगी। इतने सालों से तो मैं ही आपको सब्ज़ी दे रहा हूँ। गीता खुश होती और कहती बेटा तुम्हारा इतना कहना ही काफ़ी है।

गीता के मोमो का स्वाद ही इतना बेहतर है कि उसके बारे में सोचते ही मुँह में पानी आ जाता है । जैसे ही वो स्टीम का ढक्कन खोलती गरमा-गरम और चटपटी मसालेदार खुशबू गली में फैल जाती। जब भी मैं गीता की दुकान पर जाती और मेरे पास पैसे हों तो मैं मोमो के साथ-साथ रोल या फिंगर ले लेती। उसके सभी आइटम का स्वाद बढ़िया ही होता है ।
उसके मोमो की ख़ासियत ये है कि उनके मोमो की लेयर ज़्यादा मोटी नहीं होती और उसकी ग्रेवी भी एकदम चटपटी होती है। मैं तो मोमो के ऊपर उनसे काफ़ी सारा मसाला डलवाती जिससे स्वाद दोगुना हो जाता। मुझे मोमो के साथ मेयोनीज खाना पसंद नहीं है, लेकिन उनकी मेयोनीज इतनी गाढ़ी होती है कि मैं वो खाने को मजबूर हो जाती हूँ। और तो और उनसे चटनी कितनी भी बार माँगो वो कहती और ले लेना बेटा। चटनी तो उनकी इतनी तीखी और मस्त होती है कि स्वाद सोचते ही मुँह में पानी आ जाता है। उनसे लोग काफ़ी बार कहकर जा चुके हैं कि आप ऐसे ही टेस्टी चटनी बनाया करो बहुत मज़ा आता है खाने में, हमको तो आपकी चटनी का स्वाद यहाँ की सभी दुकानों में सबसे अच्छा लगता है। वो सभी के मुँह से तारीफ़ सुनकर खुश होती। उनका काम करने का हौसला लोगों के प्यार भरे तारीफ़ के शब्दों से ओर भी बढ़ जाता।

त्रिलोकपुरी में गीता को घर झुग्गी टूटने के बाद मिला था। गीता का कहना है कि वह तब से यहाँ रह रही है जब त्रिलोकपुरी बसा भी नहीं था। इस गली के आधे से ज़्यादा घर उन्हीं के बसाए हुए हैं। कोई उन्हें दादी, अम्मा, बहन, माँजी कहता तो कोई भाभी। अगर कभी वह घर से बाहर नहीं निकलती तो लोगों को पता लग जाता है कि आज उसकी तबीयत ठीक नहीं है। सभी उसे देखने के लिए एक के बाद एक घर आने लगते। जिसे देख गीता का मन खुश हो रहता। 

गीता बताती है कि उनका काम सबसे ज़्यादा सर्दी के मौसम में चलता है, क्योंकि उस समय लोग गरमागरम चीज़ें खाना ज़्यादा पसंद करते हैं । सर्दी में सामान समय से पहले ही ख़त्म हो जाता है। सर्दी में भी वह चार बजे ही उठती है फिर रोज़ का रूटीन और मोमो बिक जाने के बाद घर आकर आराम करतीं। मोमो बेचने से कम से कम वह अपनी दवाई का तो ख़र्च निकाल ही लेती हैं। वैसे तो उनका बेटा बहू खाना पीना दे देते हैं और कहते हैं कि माँ आप आराम करो, ये सब काम बंद कर दो। लेकिन वह अपने बेटे से रोज़-रोज़ दवाई का ख़र्च नहीं माँगना चाहतीं इसलिए वह मोमो बेचना छोड़ती नहीं। ओर तो ओर इस उम्र में हाथ-पैर से काम न करवाओ तो ये चलने बंद हो जाते हैं इसलिए एक मिनट भी वह बिना काम किए बैठी रह नहीं सकती।

गीता बताती है कि बरसात के मौसम में भी उनका काम ठीक चलता है। लेकिन कई बार अचानक से मौसम बदल जाने पर छाता ना होने से सामान को जल्दी घर के बाहर तक पहुँचाना होता है। वह बताती है कि एक बड़ा छाता ऐसे मौसम में रखती हूँ ताकि किसी भी समय छाते से अपनी दुकान ढकी जा सके। गीता बताती है कि कई बार जगह-जगह कीचड़ होने की वजह से उसे झाड़ू भी दो-तीन बार लगानी पड़ जाती है क्योंकि कीचड़ में लोग खड़ा होना पसंद नहीं करते।

गीता का कहना है कि गर्मियों के मौसम में काम मंदा पड़ जाता है, क्योंकि इस समय लोगों को ठंडी चीज़ें ज़्यादातर पीने वाली चीजें पसंद होती हैं। इस वज़ह से सिर्फ़ गर्मी के मौसम में ही थोड़े बहुत मोमो बच जाते हैं । बाकी दिन तो मैं मोमो भी बहुत कम बनाती हूँ ताकि बचे ही न!  

गीता पहले स्टीम मोमो ही बेचा करती थी फ़िर लोगो ने कहा कि आप फ्राई मोमो भी बेचा करो न, वो ज़्यादा अच्छे लगते हैं। तब से वह स्टीम मोमो बेचना बंद करके सिर्फ़ फ्राई मोमो बेचती है। लेकिन कई बार मोमो फ्राय करते समय कुछ छींटे गीता के हाथ और चेहरे पर पड़ जाते हैं जिसके निशान अभी भी उसके हाथों पर दिखाई देते हैं। गीता बताती है कि मोमो को पहले स्टीम करो फिर फ्राई करो तो गैस ज़्यादा लगती है, इसलिए वह डायरेक्ट फ्राई कर देती है और लोगो को वो पसंद भी बहुत आते हैं। मौसम कोई भी हो बिक्री तो शाम के वक़्त ही सबसे ज़्यादा होती है। उस वक़्त ऑफ़िस से लौट रहे लोग भी ठेले पर आ जाते हैं।

कई बार मोमो फ्राई करने से धुआँ होता हैं जो आँखों को लगता है, लेकिन अब तो आदत-सी हो गई है। गीता बताती है कि शुरू-शुरू में बहुत दिक़्क़त होती थी आँखों में दर्द होने लग जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। गैस के सामने खड़े होने पर गर्मी भी लगती है और बीपी भी हाई हो जाता है, इसलिए कई बार वह कुछ देर बैठ जाती है, ठंडा पानी पी लेती है तब जाकर थोड़ा आराम मिलता है। गैस के पास खड़े होने से कई बार गीता को पसीने आते है, वह नाइटी के साथ के चुन्नी को ही कई बार अपना रुमाल बना उसी से अपना पसीना पोंछने लगती है। जिससे कई बार चेहरा लाल  हो जाता है। गीता की मोमो की दुकान बहुतों के लिए स्वाद से रूबरू होने की जगह है तो वहीं गीता को भी इससे मन भी लगा रहता है और हाथ में कुछ पैसे भी आ जाते हैं।

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सबाल्टर्न फ़ैशन- फ़ैशन की दुनिया में प्रवेश / प्रियांशी

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अब तो यह मन का काम है/ प्रियांशी