मौत / अनुराधा

कुछ हफ़्ते पहले की बात है। 15 नवंबर 2025 को मैं स्कूल से घर आई तो काफ़ी थक गई थी। स्कूल से आकर चार-पाँच घंटे सो गई। माहौल एकदम शांत था। अचानक मेरे कानों में आवाज़ आई ‘क्या और कब?’ बाहर शोर हो रहा था। मैं घबरा गई। उठकर बाहर गई तो देखा सब घबराए हुए थे। मेरे दादा फ़ोन पर किसी से बात कर रहे थे। उनके पास ही बड़े पापा भी खड़े थे। कोई मुझे कुछ नहीं बता रहा था। कुछ देर बाद बड़े पापा ने बोला ‘तेरी बड़ी बुआ के बेटे की तबीयत ख़राब हो गई है।’ मैंने सोचा इसमें घबराने की क्या बात है? तबीयत तो सबकी ख़राब होती है।

मैं बड़ी मम्मी के रूम में गई तो देखा कि मोहल्ले की सारी औरतें उनके रूम में जमा थी और सभी घबराई हुई लग रही थीं। मैंने सोचा यह कोई छोटी बात नहीं है फिर मैं अपनी चाची से पूछी कि क्या बात है? चाची बोलीं, ‘फूफा का फ़ोन आया था। वह बोलें कि गाँव जा रहे हैं।’ मैंने सोचा शायद फूफा के साथ बड़े पापा भी गाँव जा रहे हैं।

क्योंकि वह भी गाँव जाने की बात कर रहे थे। मेरा व्यवहार वैसा ही था जैसे रोज़ रहता है। अगले दिन अचानक से मम्मी और पापा ने प्लान बनाया कि गाँव जाना है। मैं बहुत खुश हुई, सोचा वहाँ ख़ूब घुमूँगी, ख़ूब खेलूँगी बहनों से मिलूँगी, नानी के घर जाऊँगी और दोनों बुआ से भी मिलूँगी। साथ ही यह भी सोच रही थी कि अचानक से पापा ने गाँव जाने का फ़ैसला क्यों किया? फिर मैंने सोचा मुझे इससे क्या मतलब, मुझे तो बस गाँव जाने की खुशी हो रही थी।

शाम को हम गाँव जाने के लिए ऑटो में बैठे ही थे कि मेरी नज़र अचानक से मम्मी के चेहरे पर गई। मम्मी बहुत शांत मगर मुरझाई हुई लग रही थीं। वैसे तो हमेशा गाँव जाने की उन्हें खुशी रहती थी पर इस बार ऐसा क्या हुआ है, समझ नहीं आया।

मैंने सोचा शायद मम्मी की तबीयत ख़राब हो। यह सब सोचते हुए मैं ऑटो से बाहर देखने लगी। मेरा भाई बार-बार ऑटो से बाहर हाथ निकाल खुश हो रहा था। और मम्मी बार-बार मना कर रही थीं, पर वह कहाँ मानने वाला था ।

आज मम्मी के साथ पापा भी हम पर चिल्ला रहे थे। ‘पापा ने कहा तू तो बड़ी है, अपने भाई के साथ तू बच्चा क्यों बन रही है।’

मैं उदास हो गई और मेरा भाई भी शांत हो गया।

हम स्टेशन पहुँचे तो पता चला ट्रेन आधा घंटा लेट है। फिर, हम दोनों भाई-बहन स्टेशन पर भी शैतानी करने लगे। चारों तरफ़ ट्रेन की चलने और अनाउसमेंट का शोर था। मैं बार-बार अपने भाई को ट्रेन की पटरी की साइड पर खड़े होने से रोक रही थी। स्टेशन पर बहुत भीड़ थी। हम अपनी ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे।

कुछ देर बाद मैंने सोचा कि पापा तो कभी गाँव जाने को नहीं कहते थे। आज उन्होंने गाँव चलने को क्यों कहा? फिर मेरा भाई मेरा ध्यान भटकाने लगा। अचानक से गाँव का प्लान बनाने के कारण हमें टिकट नहीं मिला था, हमें चालू डिब्बे में बैठना पड़ा। हमारे साथ पिंटू चाचा भी थे। मेरे पापा ने किसी तरह सीट ढूँढ़ी, चाचा, भाई, मम्मी, और मुझे सीट पर बिठाया।

हाँ! हम एक ही जगह सीट पर नहीं थे, दो और दीदी साथ थीं जिनके साथ मैने बहुत मज़ा किया। उनके साथ लूडो भी खेला, साँप सीढ़ी वाला भी खेला, बातें भी कीं और बहुत सारी मस्ती की। मेरे ही सामने मेरा भाई बैठा हुआ था। ट्रेन में बार बार चाय वाला और चीज़ बेचने वाला आता। मैं भाई के साथ मम्मी से ख़रीदने की ज़िद करती , पर मम्मी ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें दिखा इंकार कर देती।

हम सब तो आराम से बैठे थे। पापा को रात भर ट्रेन में खड़े-खड़े आना पड़ा। अगले दिन जब आँख खुली तो मुझे अलग-सा महसूस हुआ। मैंने भाई से कहा ‘यह हवा ये खुशबू कुछ तो अलग है।’

मैं सबसे ऊपर की सीट पर बैठी थी, पापा ने मुझे नीचे उतारा। खिड़की से बाहर देखा तो पता चला कि हम गाँव में घुस चुके हैं। दूर-दूर तक खेतों में हरियाली छाई हुई थी। पेड़ों को देखना खूब अच्छा लग रहा था। हम जौनपुर स्टेशन पहुँच चुके थे। स्टेशन से बाहर निकले तो पापा ने ऑटो किया। कुछ देर बाद हम अपने घर पहुँचे। वहाँ मुझे सरप्राइज मिला मेरी चाची और मेरी बहन वहीं पर थी। मुझे बहुत खुशी हुई मैं खुशी के मारे उछलने लगी।

हम गाँव वाले घर में थोड़ी देर बैठे। सभी जल्दी जल्दी तैयार होने लगे। मैंने पापा से पूछा कमरे की सफ़ाई नहीं करनी। वे बोले, नहीं! हम बुआ के घर जा रहे हैं जल्दी तैयार हो जा। मम्मी से पूछ कि कितना और टाइम लगेगा। आधे घंटे में तैयारी हो गई।

हमारे घर से बुआ का घर ज़्यादा दूर नहीं था, मुझे लगा आज तो बुआ के घर पार्टी है। वहाँ मेरे दो भाई बहन हैं, जिनके साथ मेरी जोड़ी जमती है।

वहाँ पर भाई, पापा, मम्मी, चाची, दादा, बड़ी दादी, बड़े दादा, घर के पीछे के लोग,पड़ोसी सभी थे। मैं घर के अंदर गई, देखा, कोई भी नहीं था। बाहर से शोर आ रहा था। घर के पीछे गई तो देखा मेरी आँखों के सामने सफ़ेद टेंट लगा था। अगरबत्ती की ऐसी खुशबू तो मंदिरों से भी कभी नहीं आई। मैं थोड़ा आगे गई तो देखा कि सबने किसी चीज़ को घेर रखा है और रोने की आवाज़ आ रही है।

मुझे अब थोड़ी-थोड़ी घबराहट होने लगी। दिल की धड़कन तेज़ होने लगी। हाथ-पैर काँपने लगे। सफ़ेद कपड़े से कुछ ढका रखा था। पीछे कुछ लोग बाइक से उतरे और सीधा भीड़ की तरफ़ गए। मैंने देखा सब की आँखें नम थी, सबके चेहरे उतरे हुए थे। कुछ देर बाद किसी ने उस सफ़ेेद कपड़े को उठाया तो मेरे पैर तले की ज़मीन खिसक गई। मुझे देखकर बुआ और तेज़ी से रोने लगी।

घर से यहाँ तक आने की खुशी एक सेकंड में दुख में बदल गई। चारों ओर से रोने की आवाज़ आ रही थी। मैं खुद को सँभालते हुए बुआ के पास गई। मेरे सामने मेरे भैया की लाश पड़ी थी, मेरी बुआ के एकलौटे बेटे की। वो इंसान जो सबको हँसाता था, हम सभी को प्यार करता था आज वो शांत पड़ा हुआ था। मेरी बुआ बार-बार उनके सिने पर सर रखकर धड़कनें सुनती और चिल्ला-चिल्ला कर कहती, अरे ये ज़िंदा है, तुम सब ने ये क्या किया, और मेरे पापा को बोलती भाई देख, ये ज़िंदा है। मैं कब से कह रही हूँ कि उठ जा, पर ये उठता ही नहीं।

मेरे भईया की लाश के सिरहाने अगरबत्ती का धुआँ उठ रहा था। ऐसा लग रहा था आज भईया थककर सो गए हैं। मेरी बुआ बार बार उनको दुलार करती और आसपास बैठी औरतें उन्हें समझाती, अरे दीदी मान जाओ, ऐसे मत करो। वो उन्हें देखकर बेहोश हो जाती। मेरी मम्मी और चाची उन्हें सँभालने की कोशिश कर रही थी। वो कहतीं मेरा बेटा चला गया मैं कैसे जिऊँगी, मुझसे ज़िद कौन करेगा। मेरी मम्मी मेरे भाई को बुलाकर बोली ये रहा आपका बेटा। ये भी तो सूरज की तरह है।

सूरज मेरी बुआ जी के बेटे का नाम था। अभी वो ग्यारहवीं में पढ़ता था। एक छोटी बहन और थी। वो भी बोले जा रही थी, मम्मी भईया को उठाओ न। जैसे ही उसने मुझे देखा तो बोली, दीदी देख, भईया नहीं हैं। मैं बहन के गले लग कर रोने लगी।

सब आपस में बात कर रहे थे अब किसका इंतज़ार है। कल से मिट्टी (लाश) पड़ी हैं, जल्दी अंतिम संस्कार करना होगा। सभी मेरे फूफा को समझा रहे थे, भाई साहब चलो। जो किस्मत में है वो तो होना ही है। मेरे फूफा ज़ोर से रोए, अरे जवान बच्चे की मिट्टी लेकर जा रहा हूँ, मैं कैसे करूँ, टाइफाइड ही खा गया मेरे बच्चे को। अब देखो मेरा बच्चा ही हाथ से निकल गया। मेरे कानों में ये सभी आवाज़ें टकरा टकरा कर आ रही थी। आसपड़ोस के लोग सूरज की तारीफ़ कर रहे थे। वो कितना होनहार था, कितने सपने थे और उसका व्यवहार कैसा था।

इधर मैं बस बुआ के बारे में सोच रही थी। उस टाइम तो बस ऐसा महसूस हो रहा था कि मेरी बुआ अब कैसे रहगी? लोग आ रहे थे बहुत लोग जा भी रहे थे। लेकिन सभी की आँखों से झर-झर आँसू गिर रहे थे। मैं यहाँ जब भी आती तो अपने भैया के साथ खेलती थी घूमती थी उनको राखी बाँधती थी, यह सब आँखों के सामने आ रहा था। एक सन्नाटा पसर रहा था।

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सन्नाटा भरा माहौल / प्रियांशी